अबूझमाड़:- जब सरकार नहीं पहुँची, तो गाँव ने खुद रास्ता बना लिया
अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाके में सड़क सिर्फ विकास नहीं, जीवन रेखा होती है। लेकिन नारायणपुर जिले की पंचायत गोमे के ग्राम कसोड तक यह जीवन रेखा वर्षों तक सिर्फ कागज़ों में ही रही। थक हारकर ग्रामीणों ने इंतज़ार छोड़ दिया और फावड़ा-कुदाल उठाकर खुद 30 किलोमीटर लंबी सड़क बना डाली।
प्रशासनिक उपेक्षा के बीच जनश्रम का संकल्प
ग्राम कसोड के लोगों का कहना है कि सड़क की मांग वे सालों से जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से करते रहे, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। बरसात में हालात और भी बदतर हो जाते थे—बीमारों को कंधों पर ढोना पड़ता, बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और राशन तक समय पर नहीं पहुँचता।
महिलाओं, बुज़ुर्गों और युवाओं ने मिलकर किया काम
इस सड़क निर्माण में गांव का हर वर्ग शामिल रहा। पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं और युवाओं ने भी श्रमदान किया। न कोई ठेकेदार, न मशीनें—सिर्फ सामूहिक इच्छा शक्ति और रोज़मर्रा के औज़ार।
विकास के दावों पर बड़ा सवाल
ग्रामीणों की यह पहल एक तरफ आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर दिखाती है, तो दूसरी तरफ सरकारी योजनाओं और विकास दावों पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है। अगर ग्रामीणों में यह जज़्बा न होता, तो आज भी कसोड मुख्य मार्ग से कटा रहता।
सड़क बनी, लेकिन सवाल बाकी हैं
ग्रामीण खुश हैं कि अब आवाजाही आसान होगी, लेकिन वे यह भी पूछते हैं—
“क्या हमारा हक हमें ऐसे ही खुद बनाना पड़ेगा?”
यह सड़क सिर्फ मिट्टी और पत्थरों की नहीं है, बल्कि सिस्टम की खामियों और जनता की ताकत—दोनों की कहानी है।








































































































