अंबिकापुर डिजनीलैंड मेले में सुरक्षा भगवान भरोसे! हजारों की भीड़, लेकिन फायर सेफ्टी और एम्बुलेंस तक नहीं
घड़ी चौक स्थित कला केंद्र मैदान में वर्षों से लग रहा मेला, शहर में हो रहे आगजनी और हादसे के खतरे के बीच प्रशासन की तैयारी पर उठे सवाल
अंबिकापुर/08/05/2026 शहर के सबसे व्यस्त और हृदय स्थल कहे जाने वाले घड़ी चौक के पास स्थित कला केंद्र मैदान में इन दिनों डिजनीलैंड मेला सजा हुआ है। हर साल की तरह इस बार भी मेले में भारी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक मेले का आनंद लेने के लिए देर रात तक यहां मौजूद रहते हैं। मेले में कपड़े, घरेलू उपयोग के सामान, खिलौनों की दुकानें, खानपान स्टॉल और बड़े-बड़े झूले लगाए गए हैं, जिससे यह लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। लेकिन मेले में उमड़ रही हजारों की भीड़ के बीच सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा व्यवस्था को लेकर खड़ा हो गया है। मौके पर फायर सेफ्टी के पर्याप्त इंतजाम दिखाई नहीं दे रहे हैं। गर्मी के मौसम में लगातार बढ़ते तापमान और शॉर्ट सर्किट की घटनाओं के बीच यह स्थिति कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। मेले में कहीं भी फायर एक्सटिंग्विशर, पानी टैंकर या अग्निशमन वाहन की व्यवस्था नजर नहीं आई। वहीं किसी भी इमरजेंसी स्थिति से निपटने के लिए एम्बुलेंस या मेडिकल टीम भी मौजूद नहीं है। अगर झूले में तकनीकी खराबी आ जाए या आग लगने जैसी घटना हो जाए तो हजारों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है। मेले में लगाए गए बड़े झूलों की सुरक्षा जांच को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कई बार खुले मैदान में अस्थायी तरीके से लगाए गए झूलों में तकनीकी दिक्कतें सामने आती रही हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां सुरक्षा मानकों को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही है। बच्चों और महिलाओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी के बीच यह लापरवाही चिंता का विषय बन गई है।
मांग है कि मेले की सुरक्षा व्यवस्था का तत्काल निरीक्षण किया जाए। साथ ही फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस, मेडिकल सहायता केंद्र और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए ताकि किसी भी अप्रिय घटना से पहले जरूरी इंतजाम किए जा सकें।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी हादसे का इंतजार कर रहा है, या समय रहते मेले में सुरक्षा मानकों को लागू किया जाएगा।
शहर के बीचों-बीच लगा मीनाबाजार इन दिनों लोगों के मनोरंजन का केंद्र जरूर बना हुआ है, लेकिन जमीन पर मौजूद हालात किसी बड़े हादसे की चेतावनी दे रहे हैं। रोज हजारों की भीड़ जुट रही है, बच्चे झूलों का आनंद ले रहे हैं, परिवार खरीदारी कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस भारी भीड़ की सुरक्षा का कोई जिम्मेदार इंतजाम भी है या सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है?
मेला परिसर में फायर सेफ्टी के नाम पर लगाए गए अग्निशमन सिलेंडरों की हालत खुद खतरे की कहानी बयां कर रही है। कई सिलेंडरों की वैधता समाप्त बताई जा रही है, तो कुछ पर तारीखों में छेड़छाड़ के आरोप हैं। कई सिलेंडरों पर न रिफिलिंग की जानकारी है और न ही जांच का कोई रिकॉर्ड। यानी अगर अचानक आग भड़क जाए, तो ये सिलेंडर लोगों की जान बचाएंगे या सिर्फ लोहे का शोपीस साबित होंगे — यह बड़ा सवाल है।
हैरानी की बात यह है कि हजारों लोगों की भीड़ वाले इस मेले में न कोई एंबुलेंस तैनात है और न ही फायर ब्रिगेड की टीम। आयोजकों का दावा है कि जरूरत पड़ने पर निजी वाहन उपलब्ध हैं, लेकिन क्या किसी गंभीर हादसे में निजी गाड़ी ICU जैसी सुविधा दे सकती है? क्या हादसे के वक्त घायल लोगों को स्ट्रेचर, ऑक्सीजन और प्राथमिक इलाज भी नसीब हो पाएगा?
स्थिति तब और डराने वाली हो जाती है जब मेले में बनाए गए “पुलिस सहायता केंद्र” की सच्चाई सामने आती है। नाम पुलिस सहायता केंद्र, लेकिन मौके पर एक भी पुलिसकर्मी मौजूद नहीं। सुरक्षा का जिम्मा निजी गार्डों के भरोसे छोड़ दिया गया है।
मेला संचालक का कहना है कि हमारे पास पर्याप्त संसाधन हैं, सभी सिलेंडर नए हैं, किसी में भी एक्सपायरी डेट नहीं है ! एम्बुलेंस की जरूरत नहीं, हमारे पास निजी वाहन है! पुलिस की जरूरत होती है तो फोन कर बुला लेते हैं, हमारे निजी गार्ड ही सब संभाल लेते हैं। इसलिए पुलिस सहायता केंद्र में पुलिस नहीं भी है तो दिक्कत नहीं है!
सवाल उठ रहा है कि क्या अब कानून व्यवस्था भी ठेके पर चलेगी?
मेले में बड़े-बड़े झूले, बिजली के अस्थायी कनेक्शन, भीड़भाड़ वाले रास्ते और रात तक चलने वाली गतिविधियां किसी भी वक्त खतरे का कारण बन सकती हैं। हाल ही में शहर में आगजनी और आपराधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं, इसके बावजूद इतने बड़े आयोजन में सुरक्षा और इमरजेंसी व्यवस्था का अभाव सीधे तौर पर लापरवाही की ओर इशारा करता है।
सबसे चिंता की बात यह है कि इस मेले में रोज महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। लेकिन सुरक्षा इंतजामों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो लोगों की जान की कीमत सिर्फ टिकट तक सीमित होकर रह गई है।
अब सवाल प्रशासन से है —
क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही सिस्टम जागेगा?
क्या प्रशासन किसी चीख, आग या भगदड़ का इंतजार कर रहा है?
क्योंकि अगर वक्त रहते इंतजाम नहीं हुए, तो मीनाबाजार की चमक-दमक कभी भी मातम में बदल सकती है।






































































































