अम्बिकापुर 23 जुलाई 2026/ इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल एवं निदेशक विस्तार डॉ. एस.एस. टुटेजा के मार्गदर्शन में कृषि विज्ञान केंद्र, सरगुजा द्वारा जिले के किसानों को खरीफ मौसम में मक्का फसल में लगने वाले विनाशकारी कीट फॉल आर्मी वर्म (Fall Army Worm) के संबंध में लगातार जागरूक किया जा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र, सरगुजा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. संदीप शर्मा ने बताया कि वर्तमान समय में मक्का फसल के लिए फॉल आर्मी वर्म सबसे अधिक हानिकारक कीट है, जो फसल की विभिन्न अवस्थाओं में गंभीर नुकसान पहुंचाकर उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है। उन्होंने किसानों से समय रहते इसकी पहचान कर समन्वित कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाने की अपील की है।
डॉ. शर्मा ने बताया कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य में मक्का का क्षेत्रफल लगभग 2 लाख 19 हजार हेक्टेयर है, जबकि सरगुजा जिले में लगभग 22 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मक्का की खेती की जाती है। ऐसे में यदि इस कीट का समय पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
उन्होंने बताया कि फॉल आर्मी वर्म की मादा पतंगा मक्का की पत्तियों की निचली सतह पर 50 से 150 अंडों के समूह में अंडे देती है। ये अंडे लगभग 4 से 5 दिनों के भीतर फूट जाते हैं, जिनसे छोटी-छोटी सूंडियां निकलती हैं। प्रारंभिक अवस्था में इन सूंडियों का रंग हल्का पीला, भूरा अथवा हरा एवं धुंधला स्लेटी होता है। इनके सिर का रंग लाल-भूरा होता है तथा सिर पर आंखों के बीच अंग्रेजी अक्षर ‘Y’ के उल्टे आकार की सफेद धारियां स्पष्ट दिखाई देती हैं, जो इस कीट की प्रमुख पहचान है।
उन्होंने बताया कि इस कीट की सूंडी छः अवस्थाओं से होकर गुजरती है तथा सूंडी की अवधि लगभग 15 से 18 दिनों तक रहती है। विकसित सूंडी के पिछले भाग पर वर्गाकार रूप में चार काले बिंदु स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके बाद कीट प्यूपा अवस्था में पहुंचता है, जिसका रंग लाल-भूरा होता है तथा लगभग 7 से 9 दिनों के बाद वयस्क पतंगा निकलता है। सामान्य परिस्थितियों में इसका संपूर्ण जीवन चक्र 30 से 35 दिनों में पूरा हो जाता है, हालांकि तापमान एवं जलवायु के अनुसार इसमें परिवर्तन हो सकता है।
कैसे पहुंचाता है नुकसान
डॉ. शर्मा ने बताया कि प्रारंभिक अवस्था में सूंडियां मक्का की पत्तियों की ऊपरी सतह को खुरचकर खाती हैं, जिससे पत्तियों पर चांदी जैसी पारदर्शी झिल्ली दिखाई देने लगती है। इसके बाद पत्तियों में छोटे-छोटे छेद बनते हैं, जो आगे चलकर बड़े छिद्रों में बदल जाते हैं। अधिक प्रकोप होने पर सूंडियां पूरी पत्तियों को नष्ट कर देती हैं, जिससे पत्तियां कटी-फटी दिखाई देती हैं। बाद की अवस्था में यह सूंडी मक्का के भुट्टों के अंदर प्रवेश कर दानों को भी नुकसान पहुंचाती है, जिससे उत्पादन में कमी आती है।
समन्वित कीट प्रबंधन अपनाना आवश्यक
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शर्मा ने बताया कि केवल रासायनिक दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को समन्वित कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाना चाहिए। इसके अंतर्गत निम्न उपाय प्रभावी हैं,गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें, जिससे मिट्टी में छिपे प्यूपा नष्ट हो सकें। मिश्रित अथवा अंतरवर्ती खेती अपनाएं। समय पर बुवाई करें तथा खेत को खरपतवार मुक्त रखें, क्योंकि खरपतवार फॉल आर्मी वर्म के लिए आश्रय स्थल का कार्य करते हैं। खेत में दिखाई देने वाली बड़ी सूंडियों एवं अंडों के समूहों को एकत्र कर नष्ट करें। प्रभावित पौधों की गोभ (व्हॉर्ल) में मिट्टी, लकड़ी की राख अथवा बारीक रेत का प्रयोग करें, जिससे सूंडियों का नियंत्रण किया जा सके। कीट की निगरानी एवं नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप तथा लाइट ट्रैप का अधिक से अधिक उपयोग करें। फसल की प्रारंभिक अवस्था में प्रति एकड़ लगभग 10 टी-आकार के बांस लगाएं, ताकि पक्षी बैठकर सूंडियों का भक्षण कर सकें। मित्र कीटों जैसे ईयरविग एवं ग्राउंड बीटल का संरक्षण करें, क्योंकि ये फॉल आर्मी वर्म की सूंडियों का प्राकृतिक रूप से भक्षण करते हैं।
जैविक नियंत्रण को दें प्राथमिकता
डॉ. शर्मा ने बताया कि छोटी सूंडियों के दिखाई देने पर किसानों को 5 प्रतिशत एनएसकेई (NSKE) अथवा एजाडिरैक्टिन 1500 पीपीएम का 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए। उन्होंने बताया कि मेटाराइजियम एनीसोप्ली अथवा ब्यूवेरिया बेसियाना आधारित जैविक फफूंदनाशी उत्पादों का 1×10⁸ सीएफयू प्रति ग्राम क्षमता वाले उत्पाद की 5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से बुवाई के 15 से 25 दिन के बीच अथवा आवश्यकता अनुसार छिड़काव करने से भी अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
आवश्यकता पड़ने पर ही करें रासायनिक नियंत्रण
डॉ. शर्मा ने बताया कि यदि खेत में 10 से 20 प्रतिशत पौधों पर फॉल आर्मी वर्म का प्रकोप दिखाई दे तो वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी @ 0.4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी, अथवा थायमेथोक्साम 12.6 प्रतिशत + लैम्ब्डा सायहेलोथ्रिन 9.5 प्रतिशत जेडसी @ 0.25 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी, अथवा स्पाइनेटोराम 11.7 प्रतिशत एससी @ 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव किया जा सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि फसल के परिपक्व होने की अवस्था में किसी भी प्रकार के रासायनिक कीटनाशक का प्रयोग नहीं करना चाहिए, ताकि उपज सुरक्षित एवं गुणवत्तायुक्त बनी रहे।
किसानों से की गई अपील
कृषि विज्ञान केंद्र, सरगुजा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. संदीप शर्मा ने किसानों से अपील की है कि वे मक्का फसल का नियमित निरीक्षण करें, प्रारंभिक अवस्था में ही फॉल आर्मी वर्म की पहचान कर समन्वित कीट प्रबंधन के उपाय अपनाएं तथा आवश्यकता होने पर ही वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार जैविक अथवा रासायनिक नियंत्रण करें। समय पर किए गए प्रभावी प्रबंधन से फसल को इस विनाशकारी कीट से सुरक्षित रखते हुए उत्पादन एवं किसानों की आय में वृद्धि सुनिश्चित की जा सकती है।
फॉल आर्मी वर्म मक्का फसल के लिए विनाशकारी कीट, समय पर समन्वित प्रबंधन अपनाकर करें नियंत्रण – डॉ. संदीप शर्मा
कृषि विज्ञान केंद्र सरगुजा ने किसानों को कीट की पहचान, जीवन चक्र एवं नियंत्रण के उपायों की दी विस्तृत जानकारी
Mahi singh Rajput
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